Rupee Dollar Connection!

Rupee Dollar Connection! यह रिश्ता क्या कहलाता है? बहुत कुछ. अगर डॉलर बढ़ता है तो उसका असर भारतीय शेयर बाज़ार पर क्या होता है? जब डॉलर बढ़ता है तो इसका भारतीय शेयर बाज़ार पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव पड़ता है. लेकिन नकारात्मक ज्यादा पड़ता है.

विदेशी निवेश (FII) पर प्रभाव

अगर डॉलर मजबूत होता है, तो विदेशी निवेशक (FII – Foreign Institutional Investors) भारतीय बाजार से पैसा निकालकर किसी दुसरे जगह निवेश करना पसंद करते है. कई बार वो अमेरिकी बाजार में भी निवेश करते है. डॉलर अगर लगातार मजबूती बनाये रखता है तो बाज़ार में selling pressure अर्थात बिकवाली शुरू हो जाती है. डॉलर मजबूत है तो इसका मतलब यह हुआ की रुपया कमज़ोर है. अगर रुपया कमज़ोर है तो इससे विदेशी निवेशकों का भारतीय बाज़ार में मनोबल टूटता है.

आयात और निर्यात पर असर

Exporters को फायदा: जब डॉलर बढ़ता है, तो भारतीय Exporters को ज्यादा पैसे मिलते है. इससे उनकी कमाई बढ़ती है. भारत की अधिकतर IT कंपनिया USA के लिए काम करती है जिसके बदले में उनकी पेमेंट US Dollars में होती है. जैसे की Infosys, TCS, Wipro etc. इनके आलावा भारत की फार्मा कंपनियां जैसे की Sun Pharma, Dr. Reddy’s इत्यादी अधिकतर अपनी दवाइयां export करती है और बदले में उन्हें भी पैसे dollars में मिलते है.

आखिर डॉलर इतना मजबूत क्यूँ है?

  • US Dollar दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों द्वारा सबसे ज़्यादा रखी जाने वाली आरक्षित मुद्रा (reserve currency) है. International Monetary Fund (IMF) के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 60% अमेरिकी डॉलर में है. सभी देश अपने भंडार को USD में रखना पसंद करते हैं क्योंकि इसे एक safe और stable currency माना जाता है.
  • US Dollar अंतरराष्ट्रीय व्यापार का मुख्य माध्यम भी है, खासकर तेल, सोना और अन्य कच्चे माल जैसी वस्तुओं की खरीददारी के लिए. कई देश अपना आयात और निर्यात USD में करते हैं, जिससे इसकी मांग बढ़ती है. पेट्रोडॉलर सिस्टम, जहाँ तेल की खरीद फरोख्त अमेरिकी डॉलर में होती है तो इससे डॉलर की स्थिति और मजबूत होती है.
  • High Liquidity and Convertibility (आसान लेनदेन और बदलाव): अमेरिकी डॉलर दुनिया की सबसे आसान और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जाने वाली मुद्रा है. इसकी liquidity और आसान convertibility इसे अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए सबसे सुविधाजनक बनाती है.
  • Global Economic Stability (वैश्विक आर्थिक स्थिरता): International business और अन्य निवेश में डॉलर के इस्तेमाल से global economic stability बरकरार रहती है. हालाँकि, इसका यह भी अर्थ है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था या monetary policy (मौद्रिक नीति) में किसी भी उतार-चढ़ाव का दुनिया भर में प्रभाव पड़ सकता है.

$ के वर्चस्व को चुनौती

US Dollar कई दशकों से दुनिया की सबसे प्रभावशाली मुद्रा रही है, लेकिन हाल के कुछ सालों से इसके वर्चस्व को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. अगर डॉलर ने मुद्रा के रूप में अपना सिक्का जमाया तो और भी मुद्राएं है जो डॉलर को टक्कर दे रही है.

  • यूरो (Euro – EUR), चीनी युआन (Chinese Yuan – CNY) और क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrency) जैसी मुद्राएं अमेरिकी डॉलर के विकल्प के रूप में उभर रही हैं.
  • यूरोप और चीन जैसे बड़े आर्थिक क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय लेनदेन के लिए अपनी खुद की मुद्राओं को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे डॉलर पर निर्भरता कम हो सकती है.
  • अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध (U.S.-China Trade War) और अन्य व्यापारिक उलझनों के कारण कई देश नए व्यापारिक गठजोड़ बना रहे हैं, जिससे डॉलर की मांग कम हो सकती है.

Dollar बढ़ने पर RBI क्या करता है?

US Dollar बढ़ने पर भारतीय रुपया कमज़ोर होता है. ऐसे में RBI कुछ कदम उठाता है ताकि स्थिरता बनी रहे. हालाँकि RBI इस बात पर भी नज़र रखता है की रुपये में गिरावट कितनी गंभीर है.

  • RBI अपने विदेशी मुद्रा भंडार अर्थात Forex Reserves से डॉलर बेचता है, जिससे डॉलर की आपूर्ति बढ़ती है और रुपये की गिरावट को एक आधार मिलता है, उसका मूल्य स्थिर होता है.
  • अगर रुपया बहुत ज्यादा गिरता है, तो RBI ब्याज दरें (interest rates) बढ़ा सकता है, जिससे विदेशी निवेशक भारत में पैसा लगाएं और डॉलर की आपूर्ति बढ़े. इसका एक असर यह भी होता है की आर्थिक प्रगति थोड़ी धीमी हो जाती है.
  • विदेशी निवेशकों को लुभाने के लिए सरकार और RBI कुछ नीतियों में बदलाव लाने की कोशिश करते है, ताकि ज्यादा से ज्यादा डॉलर भारत में आये.
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